भैरवी -तू गंगा की मौज है में जमना की धरा

राग भैरवी , भरावी थाट का राग है और यह एक अत्यन्त प्राचीन राग है । इस्कोबजाने का समय सुबह जल्दी का है , ब्रहम मुहूर्त का । मगर आजकल इसको सभी संगीत सभाओं के अंत में गाया या बजाया जाता है। अर्थात संगीत सभा का समापन राग भैरवी से ही किया जाता है। अतः अगर सभा का समापन किसी भी समय का हो तो भी अंत में इस राग को गाने बजाने की रवायत है। इस राग को प्रस्तुत करने की भी दो विधियां है - शुध्ध भैरवी और सिन्धु भैरवी । राग की संरचना इस प्रकार है --


आरोह : सा - र - ग - म - प - dha - न - सा
अवरोह : सा - न - dha - प - म - ग - र - सा
वादी स्वर : प
संवादी स्वर : सा
पकड़ ': न - सा - ग - म - dha - प - ग - म - प - ग - म - र - सा

इस राग का भारतीय फिल्मों में बहुत हुआ है । तू गंगा की मौज है में जमना का धरा जो रफी साहब ने गाया था सबसे मधुर गाना है । इसके अलावा बाबुल मेरो नैहर छूटे जाए , बहुत पुराना गीत है। लताजी का गाया जोत से जोत जलाते रहो इसी राग पर आधारित है।

आप यहाँ सुन सकते है -
१ रफी साहब का गाना तू गंगा की मौज है में जमना का -


इसके अलावा पंडित जसराज का मराठी भैरवी भजन ।



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