राग चारुकेशी : एक तू न मिला सारी दुनिया मिले तो भी क्या है

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कई ऐसे मधुर राग है जिन पर आधारी फिल्मी गाने सुपर हिट हो जाते है , लोगों के मन में रच बस जाते है मगर ज्यादातर श्रोता ये समझ नही पाते कि उस संगीत को रचने वाले संगीत कार को प्रेरणा कहाँ से मिली। शास्त्रीय संगीत कि ये विशेषता है कि इसमें गायक और वादक अपने तरीके से प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र होता है बशर्ते कि संगीत कर स्वरूप न बिगडे।

राग चारुकेशी एक संपूर्ण जाती कर राग है इसे सुबह ९ बजे से १२ बजे तक के समय में अर्थात दिन के दूसरे प्रहर में गाने बजाने कर रिवाज है । यह राग मूलतः हिन्दुस्तानी नही हो कर कर्णाटक संगीत से हिन्दुस्तानी संगीत में अनुकूलित किया गया है । कुछ ऐसे ही अन्य राग भी है जैसे बसंत मुखारी।

इस राग कि संरचना तो में नीचे दे रहा हूँ मगर , ख़ास बात यह है कि इसको अलग अलग गीत संगीत कारों ने अपने हिसाब से कुछ परिवर्तित करके सुंदर से सुंदर रचनाओं को जन्म दिया है।

संगीत कार कल्याण जी आनंद जी कर यह एक अत्यन्त प्रिया राग था और कई गानों में उन्होंने इसको प्रयोग किया था। इनमें से हिमालय कि गोद में फ़िल्म कर एक तू न मिला सारी दुनिया मिले तो भी क्या है प्रमुख है, जो कि लता जी कि मधुर आवाज में है।




इसके अलावा लताजी और मुकेश जी कर गाया मेरे हमसफर (१९७०) फ़िल्म का टाइटल गीत 'किसी राह में , किसी मोड़ पर कहीं चल न जाना तू छोड़ कार मेरे हमसफर ' इसी राग पर आधारित है । इसको आप यहाँ सुन सकते है


इसी राग पर एक और मधुर गाना १९६५ कि फिल आरजू का है । आप स्वयं अंदाज लगाईये। जी हाँ यह है बेदर्दी बालमा , तुझको मेरा मन याद करता है ।


और अंत में इस राग कि सम्पूर्ण सुन्दरता पण्डित जी ने प्रस्तुत कर दी है । यहाँ आप सुन सकते है पण्डित जस राज - "राग चारुकेशी "




structure:
Aaroha S - R - G - m - P - d - n - S'
Avroha S' - n - d - P - m - G - R - S
Vaadi P
Samvaadi S

राग चंद्रकौंस

वादी स्वर - म
संवादी स्वर - सा

आरोह - सा ग॒ म ध॒ नी सां।
अवरोह - सां नी ध॒ म ग॒ म ग॒ सा नी़़ सा।
पकड़ - ग॒ म ग॒ नी़़ सा (़ मंद्र सप्तक)

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बहुमुखी प्रतिभा के धनी सितारवादक समीप कुलकर्णी

समीप कुलकर्णी भारतीय शास्त्रीय संगीत कर एक उभरता हुआ सितारा है । पेशे से एक सोफ्टवेयर इंजिनियर तथा सितारवादक समीप ने हाल ही में श्रीरंग कलानिकेतन , तलेगांव द्वारा आयोजित पण्डित राम मराठे स्मृति संगीत प्रतियोगिता पुणे में भाग लेकर पुणे स्तर पर तथा राज्य स्तर पर पुरस्कार जीता है। अब तक १७ पुरस्कार और तीन सम्मान प्राप्त करने वाले समीर ने ६ साल की उम्र से तबला तथा ८ साल की उम्र से सितार बजाना शुरू कर दिया था

समीप एक ऐसे परिवार से है जिसके रक्त में संगीत बहता है। उनके पिता एक गणितज्ञ तथा एक वायोलिन वादक है।

समीप फिलहाल पुणे के Jopasana CoreObjects में सॉफ्ट वेएर इंजिनियर है।

'स्वरगंगा' की से समीप को बधाई और उज्जवल भविष्य के लिए शुभकामनायें ......
समीप के बारे में अधिक यहाँ देख सकते है

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